एक एहसास

‘प्रेम’ परम सत्य है, और पूर्ण निर्लिप्त भी होता है ‘प्रेम’ ……….ठीक वैसे जैसे कमल के पत्ते पर पानी की बूँद …………….. ‘मोह’ हमें बँधे रहता है, ज़कता है बंधनों में ………….. और ‘वासना’ पूर्ण आसक्ति है, जिसके होते हुए बच पाना मुश्किल है.

A thought

A small stone dropped in to water is just like a thought in your mind, it can disturb us like any thing.
However if we want to keep our self cool and calm just be like deep in depth water, which makes the stone to settle down and remains undisturbed.
So, to remain calm and cool we should be just with self, in depth with self, where every thought gets evaporated.

भ्रष्टाचार, मूल कारण, और उपाय

मेरा विश्वास है, अभी भ्रष्टाचार खून में है साफ  हो सकता है. आनुवांशिक होने पर हमे साफ कर देगा.
मूल कारण हमारे समाज मे देश और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठा का न होना.
आज़ादी के बाद एक ऐसी स्वतंत्रता मिली जिसने स्वतंत्रता के मायने ख़त्म कर दिये.

यहाँ माँ, बाप अपने बच्चे को इंजिनियर, डॉक्टर या आइ. ए. एस. बनाना चाहते हैं, इस लिए कि वो पैसा कमा सके, कहते भी हैं कि मेरा बेटा बड़ा होकर बहुत अमीर बनेगा. अच्छा इंसान, अच्छा नागरिक बने न बने. तो बच्चा पैसा खूब कमाता है, नं. एक का कमाये या दो का क्या फ़र्क पड़ता है.

मुझे इसका एक उपाय तो समझ आता है पर उसके लिए बहुत अड़चने हैं, पहली अड़चन है हमारे नेता जो इसे लागू नही होने देंगे.
अगर इस देश में प्राथमिक शिक्षा के बाद सभी ह को ४-५ साल के लिए, एक कठिन परिश्रम के साथ काम करते हुए शिक्षा प्राप्त करने को निर्देशित किया जाए, जहाँ देश के प्रति ज़िम्मेदारी, अच्छे इंसान बनाने की ज़िम्मेदारी जैसे मूल्य रोपित किए
जाए,और सरकार प्रतिबध हो की इस शिक्षा के दौरान रहने और खाने की अच्छी व्यवस्था हो और बाद में उन्हें रूचि अनुसार इंजिनियरिंग मेडिकल विज्ञान कला खेल के क्षेत्र में पढ़ाई करने का पूरा मौका दिया जाए.

देश की नागरिकता सिर्फ़ उन्हें दी जाए जो इस शिक्षा से गुजरें तो अगले २० सालों मे स्थिति मे सुधार हो सकता है. फिर चाहे वो नेता का लड़का हो या अंबानी बिरला का सबको इस देश की नागरिकता के लिए इस शिक्षा पद्धति से होकर जाना होगा.
इसके लिए मजबूत इरादों और प्रतिबद्धता की ज़रूरत होगी.
ऐसा मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं.

ब्रह्मचारी

ब्रह्मचारी शब्द को बहुत ग़लत अर्थों मे संजोया जाता है, अर्थ यह माना जाता है की ‘ब्रह्मचारी’ वह है जो की जो जीवन मे शारीरिक संभोग मे न गया हो, (तो क्या इसका मतलब ये है की वो मानसिक रूप से सोच और इच्छा के रूप मे मान में इस साभोग की कल्पना कर सकता है, उसे इसकी स्वतंत्रता है.) …….. और इस शब्द को धारण करने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व को एक विशेष साँचे में कस कर मापने की कोशिश की जाती है.

ब्रह्म + चारी= ब्रहचारी…….. यानी की ब्रह्म की ओर अग्रसर, यानी की ब्रह्म को (जो की जगत के उत्पत्ति का मूल माना गया है) जानने की ओर अग्रसर व्यक्ति. अब अगर कोई ब्रह्म को जानने की ओर अग्रसर हैउसके लिए ज़रूरी नही है की वो उन अर्थो को लेकर चले जिन्हे मान्यतवश संजोया गया है. अब हो सकता है एम.एन.राय जी ने उन्ही अर्थों को सँजोकर ये बात कही हो. अगर ऐसा है तो इसमे उनकी ग़लती नही है. पर हमारी ज़िम्मेदारी है की जब हम कुछ पढ़े तो उसका पूर्ण विश्लेषण करें, और जो बातें तर्क संगत ना लगे उसका और गहरे से विश्लेषण करें.

शारीरिक संभोग शरीर की ज़रूरत भी है, मनुष्य रूप में ये ज़रूरत रहेगी, ये अलग बात है की आध्यात्म में या यूँ कहे ब्रह्म की ओर की गति में एक स्तर के बाद शारीरिक ज़रूरतें ख़त्म होने को हो जाती है. पर विश्वामित्र जैसे ऋषि की भी साधना अगर मेनका से भंग होती है, तो यह बात हमारे वेद पुराणों मे इसी लिए बताई गये है की हम इसे समझ पायें.

मुश्किल ये है की हम अपनी उत्पत्ति के कारक(शारीरिक संभोग) को ही ग़लत मान बैठते है.उसे समझने की कोशिश नहीं करते.हमारे भारतीय समाज में ये स्थिति और विकट है.

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो पायेंगे की ‘ब्रह्मचारी’ (वह है जो की जो जीवन मे शारीरिक संभोग मे न गया हो) को देखने की उत्कंठा, एक कोरी परिकल्पना है, और खुद को ग़लत मान कर की गयी एक सही व्यक्ति की परिकल्पना है.

जिंदगी हर बार नये अंदाज से मिलती है.


जिंदगी हर बार नये अंदाज से मिलती है.
आप इसे जितना समझते है, उससे कही गहरे अर्थ के साथ, हर बार नये रूप में.

कई बार दूसरों के अकेलेपन के सामने आपका अकेलापन छोटा लगने लगता है.
मैं सोचता हूँ, की जिंदगी मे सब कुछ शायद सब कुछ सही हो जाए.

पर ये सच नहीं है, और ऐसा होना तो बिल्कुल सच नहीं.
जिंदगी अगर समंदर है तो लहरे होंगी ही, उतार चढ़ाव होगा ही.
और उस उतार चढ़ाव का जो आनंद है, वही जिंदगी है.
मुश्किल वहाँ है जब हम इस उतार चढ़ाव से जूझने लगते है.
जब हम उसे जिंदगी जा हिस्सा मानने से इनकार करते है.

किसी से पिछले दिनों मिला मैं, उनका अपना सुंदर घर है, पत्नी हैं, खुद अच्छे इंसान है, कलात्मकता से परिपूर्ण,
फिर भी एक खोज, जीवन मे.
वो एक खोज मुझमे भी है, पर लगता है, की अगले कुछ वर्षों मे जीवन मे एक स्थायित्व के बाद सब ठीक हो जाएगा.
पर समझ मे आता है, स्थायित्व बाहर से ज़्यादे भीतर की ज़रूरत है.
आय का साधन होने, घर होने, गाड़ी होने से जो स्थायित्व है, वो बाहर का है.
भीतर का स्थायित्व ज़रूरी है, गहरे में, जैसे गहरे मे सागर शांत होता है.
लहरे उपर होंगी, उतार चढ़ाव भी होगा, ये सागर की नियति है, स्थायित्व भीतर गहरे की संभावना है, उसे बाहर खोजना सतह पर खोजना ग़लत होगा.
बाहर की ओर जीवन के उतार चढ़ाव को ही अपनाना पड़ेगा, उसे जीना पड़ेगा.