ब्रह्मचारी

ब्रह्मचारी शब्द को बहुत ग़लत अर्थों मे संजोया जाता है, अर्थ यह माना जाता है की ‘ब्रह्मचारी’ वह है जो की जो जीवन मे शारीरिक संभोग मे न गया हो, (तो क्या इसका मतलब ये है की वो मानसिक रूप से सोच और इच्छा के रूप मे मान में इस साभोग की कल्पना कर सकता है, उसे इसकी स्वतंत्रता है.) …….. और इस शब्द को धारण करने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व को एक विशेष साँचे में कस कर मापने की कोशिश की जाती है.

ब्रह्म + चारी= ब्रहचारी…….. यानी की ब्रह्म की ओर अग्रसर, यानी की ब्रह्म को (जो की जगत के उत्पत्ति का मूल माना गया है) जानने की ओर अग्रसर व्यक्ति. अब अगर कोई ब्रह्म को जानने की ओर अग्रसर हैउसके लिए ज़रूरी नही है की वो उन अर्थो को लेकर चले जिन्हे मान्यतवश संजोया गया है. अब हो सकता है एम.एन.राय जी ने उन्ही अर्थों को सँजोकर ये बात कही हो. अगर ऐसा है तो इसमे उनकी ग़लती नही है. पर हमारी ज़िम्मेदारी है की जब हम कुछ पढ़े तो उसका पूर्ण विश्लेषण करें, और जो बातें तर्क संगत ना लगे उसका और गहरे से विश्लेषण करें.

शारीरिक संभोग शरीर की ज़रूरत भी है, मनुष्य रूप में ये ज़रूरत रहेगी, ये अलग बात है की आध्यात्म में या यूँ कहे ब्रह्म की ओर की गति में एक स्तर के बाद शारीरिक ज़रूरतें ख़त्म होने को हो जाती है. पर विश्वामित्र जैसे ऋषि की भी साधना अगर मेनका से भंग होती है, तो यह बात हमारे वेद पुराणों मे इसी लिए बताई गये है की हम इसे समझ पायें.

मुश्किल ये है की हम अपनी उत्पत्ति के कारक(शारीरिक संभोग) को ही ग़लत मान बैठते है.उसे समझने की कोशिश नहीं करते.हमारे भारतीय समाज में ये स्थिति और विकट है.

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो पायेंगे की ‘ब्रह्मचारी’ (वह है जो की जो जीवन मे शारीरिक संभोग मे न गया हो) को देखने की उत्कंठा, एक कोरी परिकल्पना है, और खुद को ग़लत मान कर की गयी एक सही व्यक्ति की परिकल्पना है.

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2 thoughts on “ब्रह्मचारी

  1. यह एक बहुत ही अजीब सी बात है और एक अद्भुत तथ्य भी कि हम सेक्स के ही अणुओं से बने हैं पर इसे गलत अर्थों में भी देखते हैं, शायद इसका कारन यह हो किस इसी सेक्स अर्थात वासना में अँधे होकर कई एक नरपिशाच समान लोग बर्बर एवँ अमानवीय कृत्य कर बैठते हैं और तब यही अवश्य-माननीय एवँ अवश्य-प्रयोजनीय सेक्स निश्चित-निंदनीय हो जाया करता है …. !!

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